वो मेरी माँ है

औरत के जिस्म से निकलकर औरत के हाथों में पलकर कभी गिरकर सम्भल कर ,

पकड़ा कर उंगली जो खड़ा कर देती है वो मेरी माँ है।।

भरी बरसात की रातें या गर्म दोपहरी हो ,

काँटों की सेज सी मंजिल और सांसे ठहरी हो ,

तब जो खून से सींच कर बड़ा कर देती है ,

वो मेरी माँ है।

प्यार की छाया आँखों पर दिखती है वही दिल के अंदर भी ,

ममता की छाव से हारा हुआ समंदर भी,

मेरी मुस्कान देखकर जो जी रही है ,

वो मेरी माँ है।

चिता की आग जैसे लगी हो भड़कने,

जैसे किसी आंधी में खिड़किया लगी हो खड़कने ,

मेरे घर आने की आहट से जिसका दिल लगता है धड़कने,

दिन के सपनो में जो आँखे गीली कर रहीहै

वो मेरी माँ है

मारकर अपने सपनो को जैसे कई अपनों को,

पुरानी साड़ी के कभी परदे कभी गिलाफ बनाती है,

अपनी जिंदगी के पन्नो को पूरी किताब बनाती है,

गरीब पैसो से दिल की अमीर है जो वो मेरी माँ है।।

पूजा उसकी ऎसी जैसे मंदिर और शिवाले हो भक्ति का भाव ऐसा जैसा ऊँचा खड़ा हिमालय हो,

छू ले अगर तुम्हे जो सर्द भी ताप हो जाए,

काशी की गंगा मैया भी यूँही भाप हो जाए,

बिना मसालो के भी जो सब्जी में स्वाद ला देती है ,

वो मेरी माँ है।

ऊँगली पकड़ कर जिसने मुझको सिखाया चलना,

अंगूठियां बेचकर अपनी लाई थी मेरा पलना,

एक मुस्कान भर से घर को सजा देती है,काटकर पेट अपना इंजीनियर बना देती है वो मेरी माँ है।

Written by: नितेश मिश्रा

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